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Epstein Files की तरह 2018 मुज़फ्फरपुर शेल्टर होम कांड में भी छिपे हैं कई नाम

डेस्क/ Epstein Files के काले कारनामों की लिस्ट सामने आने के बाद भारत के मुजफ्फरपुर बालिका शेल्टर होम कांड की भी यादें ताजी हो गई जो भारत के सबसे भयावह और शर्मनाक बाल यौन शोषण मामलों में से एक था। यह कोई अफ़वाह या राजनीतिक आरोप नहीं, बल्कि अदालतों और जाँच एजेंसियों द्वारा प्रमाणित अपराध है।
यह मामला 2018 में सामने आया। बिहार के मुज़फ्फरपुर जिले में बृजेश ठाकुर नामक व्यक्ति सरकार से अनुदान लेकर नाबालिग लड़कियों का शेल्टर होम चला रहा था। काग़ज़ों में यह “बालिका संरक्षण गृह” था, लेकिन असल में वह संगठित यौन शोषण, बलात्कार और तस्करी का अड्डा बन चुका था।
TISS (टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज़) की सोशल ऑडिट रिपोर्ट ने पहली बार पर्दा उठाया। रिपोर्ट में साफ़ कहा गया कि शेल्टर होम में रहने वाली बच्चियों के साथ नियमित बलात्कार, मारपीट, भूखा रखना और बाहर के “मेहमानों” को उपलब्ध कराना सामान्य बात थी। बच्चियाँ डरी हुई थीं, कई मानसिक रूप से टूट चुकी थीं।
जाँच में सामने आया कि
– शेल्टर होम को सरकारी फंड और संरक्षण मिला हुआ था
– स्थानीय प्रशासन, समाज कल्याण विभाग और पुलिस की मिलीभगत या घोर लापरवाही थी
– पीड़ित बच्चियों की शिकायतें वर्षों तक दबाई जाती रहीं
– मेडिकल जाँच तक में गड़बड़ी हुई, सबूत मिटाने की कोशिश की गई
CBI जाँच के बाद 2019–2020 में अदालत ने बृजेश ठाकुर को और कुछ सहयोगियों को आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई। अदालत ने माना कि यह “दुर्लभ से दुर्लभतम” अपराध है।
लेकिन यहीं कहानी खत्म नहीं होती।
सबसे बड़ा सवाल हमेशा अधूरा रह गया—
बृजेश ठाकुर अकेला नहीं था।
वह एक मोहरा था, जिसका इस्तेमाल शक्तिशाली लोग करते थे। कई गवाहों ने प्रभावशाली नेताओं, अधिकारियों और रसूखदार लोगों की ओर इशारा किया, लेकिन
– राजनीतिक नाम सामने नहीं आए
– बड़े संरक्षण नेटवर्क पर हाथ नहीं डाला गया
– “ऊपर तक” जाने वाली जाँच रोक दी गई
यही कारण है कि मुज़फ्फरपुर कांड की तुलना आज Epstein Files से की जा रही है।

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अंतर बस इतना है कि
अमेरिका में देर से सही, लेकिन नाम सार्वजनिक हो रहे हैं,
जबकि भारत में सिस्टम ने अपराध को सज़ा तक सीमित कर दिया, साज़िश तक नहीं पहुँचने दिया।
Epstein मामला बताता है कि यौन शोषण केवल अपराध नहीं होता, वह सत्ता, पैसा और ब्लैकमेल का नेटवर्क होता है।
मुज़फ्फरपुर कांड भी वही था—बस भारत में उस नेटवर्क को आज तक पूरी तरह उजागर नहीं किया गया।
जब तक यह सवाल खुला रहेगा कि
कौन लोग आते थे? किसके संरक्षण में यह चलता रहा? और किन लोगों को बचाया गया?
तब तक न्याय अधूरा ही रहेगा।
यह मामला सिर्फ़ बिहार का नहीं, पूरे भारतीय तंत्र के चरित्र पर लगा दाग है।

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